नारद का भ्रम
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 6 मिनट · Narada's Delusion
एक बार ब्रह्मा के पुत्र देवर्षि नारद तपस्या करने के लिए प्रवृत्त हुए। हिमालय पर एक सुरम्य गुफा में वे स्थिरचित्त हो तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या देख कर देवराज इंद्र चिंतित हो गए, उनमें असुरक्षा की भावना विकसित होने लगी। उन्हें लगने लगा कि देवर्षि देवराज का पद प्राप्त करने के उद्देश्य से ये तपस्या कर रहे हैं। इंद्र ने कामदेव को आदेश दिया कि काम के प्रभाव से वे देवर्षि की तपस्या को भंगकरें। कामदेव अपनी पत्नी देवी रति और ऋतुराज वसंत के साथ उस स्थान पर गए जहां नारद तपस्यारत थे और अपनी समस्त कलाओं का प्रयोग उन पर कर डाला। वसंत ने अपने सौंदर्य वैविध्य से तथा काम देव ने कामभाव से दग्ध करने में सक्षम बाणों से देवर्षि की तपस्या भंग करने का प्रयास किया । किंतु नारद का मन नहीं डिगा। निराश कामदेव देवराज इंद्र के पास गए और उन्हें देवर्षि पर अपनी असफलता के विषय में बताया। इंद्र सारा वृत्तांत सुन आश्चर्यचकित रह गए। उधर यह सोचकर कि मैंने कामदेव को जीत लिया है, नारद अहंकार से भर गए। वे कैलाश पहुंचे और भगवान शिव को स्वयं के द्वारा काम पर विजय पाने का प्रसंग सुनाने लगे। उनके कथन में हर्ष के साथ अहंकार भी था। उन्हें सुन लेने पर भगवान शिव ने नारद को परामर्श दिया, "देवर्षि, आप धन्य हैं, किंतु यह प्रसंग आप इसके पश्चात किसी को ना सुनाइएगा, विशेष रूप से श्री हरि विष्णु को। पर अहंकार में कहां कुछ सुनाई देता है ? देवर्षि अपने द्वारा काम को निराश करने की कथा सुनाने भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे। पिता ब्रह्मा को भी उन्होंने काम पर विजय प्राप्त करने के बारे में बताया। यह सुनकर ब्रह्मा ने भी अपने पुत्र को इस विषय में किसी से ना कहने का सुझाव दिया। नारद ने पिता ब्रह्मा की भी बात नहीं मानी। हर्षित और गर्वीले नारद अब श्री हरि विष्णु को अपनी उपलब्धि का बखान करने के लिए विष्णुलोक की ओर चले। विष्णुजी ने नारद को आते देख उनके आगमन के उद्देश्य को जान लिया। नारद के पहुंचते ही विष्णु जी बोले - देवर्षि, आप धन्य हैं. आपके आगमन से मैं पवित्र हो गया हूँ। कृपया अपने आने का कारण बताएं । विष्णुजी के ये वचन सुनकर नारद अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने भरपूर अहंकार के साथ अपनी तपस्या और कामदेव वाली कथा सुनाई. विष्णु जी ने कथा सुनकर कहा देवर्षि, आप परम ज्ञानी हैं। आप वासना से कैसे प्रभावित हो सकते हैं? अपने आराध्य से ऐसे वचन सुनकर नारद के मन में और अहंकार भर गया । किंतु श्रीहरि विष्णु के भक्त होने के कारण वे बोले प्रभु, यदि आप मेरे अनुकूल रहेंगे तो काम मेरा क्या बिगाड़ सकता है? इतना कहकर नारद विष्णुजी को प्रणाम कर के चले गये। जब नारद चले गये तो विष्णु जी ने अपनी माया से एक अद्भुत नगर बनाया। यह नगर स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर था।उस नगर के राजा अपनी पुत्री के स्वयंवर के भव्य उत्सव की तैयारी कर रहे थे। ऐसे वैभवशाली नगर को देखकर नारद मुग्ध हो गये और महल में पहुंचे। राजा ने उनका स्वागत कर उन्हें आसन ग्रहण कराया और अपनी पुत्री को उन्हें प्रणाम करने को कहा। राजा ने उनसे कहा देवर्षि, मेरी पुत्री विवाह योग्य आयु प्राप्त कर चुकी है। मैं उसके लिए एक योग्य वर खोज रहा हूं। नारद राजकुमारी के रूप पर आसक्त हो चुके थे । प्रेम से उत्तेजित हो वे श्री विष्णु जैसा मोहक रूप प्राप्त करने के लिए विष्णुलोक पहुंचे। उन्होंने श्रीविष्णु को सम्पूर्ण प्रसंग बताया और याचना की प्रभु, आप मुझे हरि का रूप प्रदान करें। हरि शब्द का एक अर्थ बंदर भी होता है। विष्णुजी ने अज्ञानवश विकसित भ्रम खंडित करने के उद्देश्य से नारद का मुख बंदर के समान कर दिया। हर्षित उल्लासित नारद स्वयंवर में पहुंचे और राजकुमारों की पंक्ति में बैठ कर सोचने लगे चूंकि मैं विष्णु के रूप में हूं, इसलिए राजकुमारी मुझे ही चुनेगी। राजकुमारी आई और वर चयन के लिए हाथों में माला लेकर पूरे मंडप में घूमने लगी। उसने किसी के गले में माला नहीं डाली. इसी बीच श्री हरि विष्णु राजा के वेश में आये. उन्हें देखते ही राजकुमारी ने वरमाला उनके गले में डाल दी। प्रेम व मोह से पीड़ित देवर्षि बहुत क्रोधित हो गये। वहां उपस्थित लोगों ने नारद से कहा- आपका राजकुमारी को पाने का प्रयास व्यर्थ ही था क्योंकि आपका मुख तो वानर के समान है। नारद ने दर्पण देखा, बंदर का चेहरा देख उन्होंने विष्णु जी से कहा हे हरि, आपने मुझे अपमानित किया, पत्नी के सुख से वंचित रखा । इसलिए आपको भी s वियोग हो। इस प्रकार नारद ने विष्णु जी को शाप दे दिया। विष्णुजी ने भक्त द्वारा दिया गया शाप चुपचाप स्वीकार कर लिया। किंतु क्रोध शांत होते ही नारद को अपने व्यवहार पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने श्री हरि विष्णु से क्षमा मांगी। ये कथा बताती है कि मोह ही व्यक्ति के ज्ञान का ह्रास कर उस से गलत कार्य कराता है।

▶सुदर्शन चक्र प्रसंगलगभग 1 मिनट
▶नंदी की कहानीलगभग 2 मिनट
▶महाशिवरात्रि की कथालगभग 4 मिनट
▶देवी सती की कथालगभग 3 मिनट
▶शिव ने जटा से वीरभद्र को प्रकट कियालगभग 1 मिनट
▶दक्ष के उद्धार हेतु ब्रह्मा और ऋषिलगभग 1 मिनट
▶भगवान शिव द्वारा दक्ष का पुनर्जीवनलगभग 1 मिनट
▶देवी पार्वती के जन्म की कथालगभग 9 मिनट
▶भगवान शिव तपस्या के लिए हिमालय आएलगभग 1 मिनट
▶कामदेव भगवान शिव की ध्यानस्थ अवस्था को भंग करने का प्रयास करते हैंलगभग 1 मिनट
▶भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दियालगभग 1 मिनट
▶सप्त ऋषियों ने पार्वती की परीक्षा लीलगभग 1 मिनटपूरी यात्रा →