देवी सती की कथा
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 3 मिनट · The Story of Sati and Daksha
एक बार देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक महत्वपूर्ण यज्ञ का आयोजन किया किन्तु उसमें अपने जामाता शिव को छोड़ कर समस्त देव, ऋषि, तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित किया । माता सती यह जान कर अपने पति भगवान शिव से बोलीं कि सभी मेरे पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में जा रहे हैं, हमें भी चलना चाहिए । शिव जी बोले - आमंत्रण बिना जाना उचित नहीं होगा, देवी । किन्तु देवी के अत्यधिक आग्रह पर शिव जी ने उन्हें जाने कि अनुमति दे दी। देवी सती ने यज्ञस्थल पर पहुँच कर अपने पिता से महादेव शिव को आमंत्रित ना करने का कारण पूछा, जिस पर दक्ष ने कहा - तुम्हारा पति शिव अमंगलरूप है और मैंने जानबूझकर उसे देवर्षियों की सभा में आमंत्रित नहीं किया है। तब अपने पति के अपमान से व्यथित सती ने कहा - जो महादेव की निन्दा करता है अथवा जो उनकी निन्दा को सुनता है वो तब तक नर्क में रहता है जब तक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं। अतः तात! मैं अपने इस शरीर को त्याग रही हूँ। अपने शरीर को त्यागने की इच्छा से सती ने अपने सम्पूर्ण अंगों में योगमार्ग के अनुसार वायु और अग्नि की धारणा कर यज्ञाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर लिया । वहाँ उपस्थित देवता ऋषि आदि यह देख हाहाकार करने लगे। देवी सती कि मृत्यु का समाचार सुन सर्वेश्वर रुद्र का रोष फूट पड़ा। उन्होंने अपनी जटाओं से एक केश उखाड़ा और उसे एक धरती पर पटका जिस से महाप्रलय के समान भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ। उस केश से महाभयंकर महाबली वीरभद्र प्रकट हुए। वे देखने में प्रलयाग्नि के समान जान प्रजापति पड़ते थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा था। वे एक हजार भुजाओं से युक्त थे। शिव जी ने उन्हें दक्षयज्ञ के ध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र गणों के साथ यज्ञ स्थल पर पहुँचकर विध्वंस करने आय लगे । देखते ही देखते उन्होंने अहंकारी प्रजापति दक्ष का सिर धड़ से अलग कर अग्निकुण्ड में डाल दिया तथा उनका प्रतिरोध करने आये दक्ष समर्थक देवताओं का अंग भंग कर दिया । प्रजापति दक्ष के पिता सृष्टि सर्जक भगवान ब्रह्मा ने विष्णु लोक पहुँच कर अपना दुख श्रीहरी विष्णु से निवेदित किया, वे पुत्र दक्ष का पुनर्जीवन चाहते थे । विष्णु जी ने उन्हें कहा कि जिन भगवान के कुपित होने पर यह सारा जगत् नष्ट हो जाता है वे इस समय अपनी प्राणवल्लभा सती से बिछुड़ गये हैं तथा अत्यन्त दुखी हैं। आप शुद्ध हृदय से शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले उन भगवान शिव से इसके लिए क्षमा मांगें और दक्ष के पुनर्जीवन हेतु विनती करें । कदाचित इस से भगवान् शिव को कुछ संतोष होगा। मैं भी आपके साथ महादेव के पास चलूँगा और क्षमा माँगूँगा। तब भगवान ब्रह्मा, श्री विष्णु, ऋषि तथा देवगण महादेव शिव के पास पहुंचे ।

▶शिव ने जटा से वीरभद्र को प्रकट कियालगभग 1 मिनट
▶दक्ष के उद्धार हेतु ब्रह्मा और ऋषिलगभग 1 मिनट
▶भगवान शिव द्वारा दक्ष का पुनर्जीवनलगभग 1 मिनट
▶देवी पार्वती के जन्म की कथालगभग 9 मिनट
▶भगवान शिव तपस्या के लिए हिमालय आएलगभग 1 मिनट
▶कामदेव भगवान शिव की ध्यानस्थ अवस्था को भंग करने का प्रयास करते हैंलगभग 1 मिनट
▶भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दियालगभग 1 मिनट
▶सप्त ऋषियों ने पार्वती की परीक्षा लीलगभग 1 मिनट
▶भगवान शिव ने पार्वती की परीक्षा लीलगभग 1 मिनट
▶पार्वती ने भगवान शिव को अपनी सखियों से परिचित करायालगभग 4 मिनट
▶भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथालगभग 4 मिनट
▶देवी पार्वती ने अग्नि देव को श्राप दियालगभग 1 मिनटपूरी यात्रा →