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देवी पार्वती के जन्म की कथा

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 9 मिनट · The Birth of Goddess Parvati

दक्ष यज्ञ में जो विध्वंस हुआ था उसमें अपनी प्राणप्रिय पत्नी देवी सती को खो देने के बाद भगवान शिव दुखी और विरक्त भाव में रहने लगे । वे सती की मृत देह को अपने कांधों पर उठाये भटकते रहते थे । तब तारकासुर नामक दैत्य ने घोर तपस्या कर भगवान ब्रहमा से अमर होने का वरदान मांगा । ब्रहमा जी ने किसी भी प्राणी के अमरत्व को प्रकृति विरुद्ध बताते हुए तारकासुर से कुछ और माँगने को कहा। तारकासुर को भगवान शिव की सुधहीन अवस्था के बारे में पता था । उनका संसार और सांसारिक गतिविधियों के प्रति विराग गहन गंभीर था । उनके उस अवस्था से लौटने की कोई राह किसी को दिखाई ना देती थी । अतः तारकासुर ने ब्रहमा जी से कहा - यदि आप मुझे अमर होने का वर नहीं दे सकते हैं तो ये वर दीजिए कि मैं शिव पुत्र के सिवा अन्य किसी के द्वारा ना मारा जा सकूं । तारकासुर निश्चित था कि शिव अब संसारिक सम्बंधों में लौटने नहीं वाले , तब ना उनकी कोई पत्नी होनी है ना पुत्र ही । ऐसे में शिव पुत्र के हाथों ही मरने जा वरदान मुझे अमर कर देगा ब्रहमा जी उसकी मूर्खता को समझ रहे थे, उन्होंने तत्काल तथात्सु कह कर उसकी इच्छा को वरदान बना दिया। स्कंद पुराण के अनुसार तारकासुर अत्यंत विनाशकारी और अधर्मी हो गया था । उसे प्राप्त वरदान के अनुसार शिवपुत्र ही उसका वध कर सकता था इसलिए उसके कर्मों से त्रस्त देवगण, ऋषि और मुनि भगवान ब्रह्मा तथा श्री हरि विष्णु के पास अपनी व्यथा लेकर पहुंचे। भगवान ब्रह्मा और श्री विष्णु ने शिवजी के पास जाकर पुत्र उत्पन्न करने के लिए प्रार्थना की। किन्तु शिव जी की अवस्था यथावत थी, देवी सती के वियोग से दुखी महादेव को कोई प्रार्थना प्रभावित नहीं कर रही थी । देवगण देवी भगवती की भी स्तुति कर रहे थे कि वे देह धारण कर भगवान शिव के साथ विवाह करें और पुत्र को जन्म दें क्योंकि संसार को तारकासुर के प्रकोप से बचाने का यही एकमात्र उपाय है । इधर हिमालय राज हिमवान और उनकी पत्नी देवी मैना भी अनेक वर्षों से देवी को पुत्री के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रहे थे । अन्ततः देवी के उन्हें दर्शन दे कर वरदान दिया कि मैं आपकी पुत्री के रूप में जन्म लूंगी तत्पश्चात देवी ने देह धारण कर हिमालय राज और मैनावती की पुत्री के रूप में जन्म लिया । पर्वत की पुत्री होने से वे पार्वती कहलाई । देवताओं में हर्षोल्लास छा गया । उन्हें अपने कष्टों से मुक्ति की आस बंधी । नन्ही पार्वती बालपन से ही शिव भक्त थीं । संस्कार और शील से सम्पन्न पार्वती आयु बढ़ने के साध एक अत्यंत सुन्दर युवती बनीं । वे हिमालय क्षेत्र में अपनी सेविकाओं और सखियों के साथ विचरण किया करती थीं । एक बार महादेव शिव भी उस क्षेत्र में ध्यान लगाने आए किन्तु वे किसी की भी उपस्थिति से अप्रभावित रहते थे । देवी ने अवश्य उनके दर्शन किए । देव और ऋषिगण ने विचार किया कि माता विवाह योग्य आयु को प्राप्त कर चूँकि किन्तु महादेव समाधि से बाहर नहीं आ रहे । उनकी समाधि भंग करनी होगी । इस कार्य के लिए कामदेव को नियुक्त किया गया । वसंत आदी के सहयोग से प्रकृति ने चरम सौंदर्य प्राप्त किया । कामदेव ने उपयुक्त अवसर पा कर समाधिस्त महादेव पर अपना अचूक पुष्पबाण चलाया । महादेव का मन तनिक विचलित हुआ, जिस से उनकी समाधि भंग हो गई ।उन्हें ये समझते देर नहीं लगी कि यह कामदेव का कार्य है। उन्होंने कामदेव को अपनी क्रोधाग्नि उन्ह ये समझत दर नहा से भस्म कर दिया । अत्यंत रूपवान देह वाले कामदेव क्षण में भस्म बन गए । उनकी पत्नी देवी रति अपने पति की ऐसी मृत्यु देख बेसुध हो गई । संसार कामहीन हो संचालित नहीं हो सकता था ।अतह देवता आदी एकत्रित हो कर शिव जी के समक्ष पहुँचे और निवेदन किया - हे भक्त वत्सल शिव, कामदेव ने जो कुछ किया उसमे उनका कोई स्वार्थ नहीं था बल्कि दुष्ट तारकासुर से पीड़ित हुए हम सब देवताओं ने ही आग्रह कर उनसे ये सब करवाया था । हे भोलेनाथ! कृपया आप इसे अन्यथा न लें । संसार के समस्त सुख देने वाले देवाधिदेव! सती-साध्वी देवी रति अपने पति कामदेव के वियोग में असहनीय विलाप कर रही हैं, आप उन पर करुणा करें । इस तरह कामदेव का अंत हम देवताओं सहित समस्त प्राणियों का भी संहार होगा । इसलिए हे करुणानिधान ! आप कामदेव को जीवन प्रदान करें । देवताओं की ये विनती सुनकर भगवान शिव के मन में करुणा जाग उठी। आशुतोष शिव ने देवताओं की प्रार्थना सुन कामदेव को निश्चित अवधि तक अनंग अर्थात देह रहित रहने किन्तु कालांतर में देह पाने का वरदान दे कर पुनर्जीवित किया । देवी पार्वती भी भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए आराधना और तपस्या कर रही थीं । उनकी भावनाओं की परीक्षा हेतु ऋषि उपस्थित हुए और शिव के लिए भला बुरा कहने लगे । वे बोले - तुम जिनके लिये यह भारी तपस्या करती हो, वे रुद्र सदा उदासीन, और निर्विकार रहते हैं। वे अमांगलिक वस्तुओं को धारण करते हैं, उनका न कहीं घर है न द्वार। वे किस कुल में उत्पन्न हुए हैं. इसका भी किसी को पता नहीं है। कुत्सित वेष धारण किये भूतों तथा प्रेत आदि के साथ वे रहते हैं और नंग-धड़ंग हो शूल धारण किये घूमते हैं। हे गिरिराज नन्दिनि! ऐसे वर को पाकर तुम्हें क्या सुख मिलेगा। उनकी ऐसी बात सुनकर जगदम्बिका पार्वती हँस पड़ीं और बोलीं- मुनीश्वरों ! मेरा शरीर पर्वत से उत्पन्न होने के कारण मुझमें भी स्वाभाविक कठोरता विद्यमान है। और जिन्हें आपने उदासीन कहा है वे गुणातीत, मायारहित, और विराद् हैं। मैं शिव को यथार्थ रूप से जानती हूँ। हे द्विजों यदि शिव मेरे साथ विवाह नहीं करेंगे तो मैं कुमारी ही रह जाऊँगी, परंतु दूसरे के साथ विवाह नहीं करूँगी । मेरा ये हठ नहीं छूट सकता। ऐसा कह उन सबको प्रणाम करके गिरिराज कुमारी पार्वती पुनह निर्विकार चित्त से शिव का स्मरण करने लगी। पार्वती देवी का समर्पण देख ऋषि उनकी जय-जयकार कर उन्हें आशीर्वाद दे कर चले गए। देवी पार्वती के समर्पण और उनके कठोर तप से प्रसन्न हो भगवान शिव ने देवी पार्वती के समक्ष उपस्थित होने का विचार किया । किन्तु वे सहज रूप से उपस्थित नहीं हो कर ब्राह्मण का रूप धारण कर के आए । माता अपनी सखियों के साथ थीं। उन्होंने ब्राह्मण रूपधारी शिव से उनका परिचय और प्रयोजन पूछा, भगवान शिव ने भी देवी से उनका परिचय पूछा । तब देवी पार्वती की सखी विजया ने ब्राह्मण रूप धरे शिव को बताया कि ये गिरिराज तथा माता मेनका की कन्या हैं। इनका नाम पार्वती है । ये पिनाकपाणि भगवान शंकर को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही हैं। तब जटाधारी ब्राह्मण का रूप धरे शिव देवी पार्वती से बोले - शिव तो कपालधारी और निर्धन हैं। उसकी जाति, विद्या और ज्ञान का कुछ पता नहीं है । तुम्हारे अंग में चंदन है किन्तु शिव- शरीर में चिता भस्म है। वो किसी भांति तुम्हारे योग्य नहीं है । यह सुन कर देवी पार्वती बहुत क्रोधित हुईं और ब्राह्मणरूप धारी शिव को फटकार के वहाँ से अन्यत्र चले जाने को उन्मुख हुईं। किन्तु उन्होने जैसे ही विपरित दिशा में जाने के लिए पैर उठाये वैसे ही भगवान शिव साक्षात स्वरूप से प्रकट हुए और उन्हें अपनी पत्नी होने का आशीर्वाद दिया।

देवी पार्वती के जन्म की कथा
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