श्री गणेश कथा
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 5 मिनट · The Story of Lord Ganesha
जगन्माता देवी पार्वती अपने पति देवाधिदेव शिव के साथ एक सफल और सुखद दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रही थीं किन्तु मातृत्व की इच्छा और वात्सल्य का भाव उन्हें संतान की कमी का बोध कराते रहते थे । इसी भाव ने उनसे एक शिशु की रचना करा डाली । इस शिशु की रचना उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन को निकाल कर की और रचना पूर्ण होने पर भरपूर ममत्व के साथ उसमें प्राण का संचार कर दिया। उनकी इच्छानुसार एक अत्यंत सुन्दर बालक पुत्र के रूप में उनके सामने था। एक बार माता पार्वती ने अपने उस पुत्र से मुख्य द्वारों की रक्षा करने को कहा और स्पष्ट रूप से उसे निर्देश दिया कि मैं स्नान को जा रही हूं तथा जब तक मैं स्नान पूरा न कर लूं तब तक किसी को भी भीतर प्रवेश न करने देना। कुछ समय बाद भगवान शिव, जो कैलाश से बाहर गए हुए थे, वे कैलाश पर लौटे। पार्वती नंदन ने भगवान व को पहले कभी देखा नहीं था । साथ ही वो एक अत्यंत आज्ञाकारी बालक थे । अतः माता की आज्ञा अनुसार उन्होंने शिव जी को भीतर जाने से रोक दिया। भगवान शिव ने बालक से कहा कि मुझे जाने दो । किंतु पार्वतीपुत्र अड़े रहे । पुनः पुनः समझाने तथा भयभीत करने के बाद भी वे नहीं माने । एक अपरिचितबालक द्वारा अपने ही घर में प्रवेश करने से रोके जाने पर भोलेनाथ शिव को बहुत क्रोध आया। उन्होंने पार्वतीपुत्र को एक धृष्ट बालक जान कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया । तभी देवी पार्वती स्नानकरके बाहर आईं। जिसके शरीर को देवी ने स्वयं रचा था, जिसमें उन्होंने अपने वात्सल्य से प्राण फूंके थे, उस पुत्र को मृत पड़ा देखकर देवी पार्वती को लगा जैसे उनके समस्त उद्देश्य, सारे स्वप्त खंडित हो गए। वे तीव्र विषाद से भर गईं । ये जान कर कि उनके लाड़ले पुत्र के प्राण स्वयं उनके पति के द्वारा लिए गए हैं, वे अत्यंत क्रोधित हो गईं, इतनी कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा । समस्त देवी देवता, तथा गणादि भय व चिंता से आकुल हो गए। त्रिपुरेश्वरी देवी पार्वती को शांत करने के लिए भगवान शिव ने बालक को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। किंतु उन्होंने देवी से कहा कि पुत्र के जिस शीश को धड़ से अलग किया गया है उसी को पुनर्स्थापित कर जीवन देना संभव ना होगा । अतः किसी अन्य प्राणी का सिर लगाना पड़ेगा । देवी पार्वती इस पर सहमत हो गईं, सभी देवी देवता तथा शिवगण हर्षित हो गए। भगवान शिव ने अपने प्रिय भक्त तथा वाहन नंदी को पुकारा। उन्होंने नंदी को आदेश दिया कि वह शीघ्र ही एक प्राणी का शीश ले आएं । नंदी एक हाथी के बच्चे का शीश ले कर लौटे । महादेव शिव ने अविलंब उस शीश को पुत्र के धड़ पर स्थापित कर उसे पुनर्जीवित कर दिया। पुत्र का नाम शिव जी ने गणेश रखा। देवी पार्वती ने पुत्र गणेश को स्नेह व हर्ष से गोद में उठा लिया। गणेश ने अपने माता पिता उपस्थित देवी देवता तथा गणों को प्रणाम किया। उपस्थित सभी देवी देवताओं ने भी बालक गणेश को ढेरों सुभाशीष एवं वरदान दिए और इन्हें बुद्धि और विवेक का स्वामी होने का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। उनके गुणों तथा मांगलिक कार्यों के लिए उन्हें विघ्नहर्ता मंगलमूर्ति कहा गया और बुद्धि तथा कला के देवता के रूप में स्वीकार किया गया । रिद्धि और सिद्धि इनकी कृपा से प्राप्त होती है। इसीलिए इनकी पत्नियों का नाम सिद्धि और सिद्धि बताया गया है। यह शुभता और लाभ भी प्रदान करते हैं। अतः इनके पुत्रों के नाम शुभ एवं लाभ बताए गए हैं। गणेश जी की विद्वत्ता के कारण ही महर्षि व्यास ने अपने महाकाव्य महाभारत को लिपिबद्ध करने का कार्य उनसे कराया। (मनोरम की धुन बजती है) जो कथा आपने अभी सुनी, यह गणेश जी के जन्म की कथाओं में सर्वाधिक प्रचलित कथा है।

▶ब्रह्मा ने त्रिपुरासुर राक्षस को वरदान दियालगभग 2 मिनट
▶ब्रह्मा और ऋषि त्रिपुरासुर के कारण अपनी कठिनाई पर चर्चा करने आएलगभग 1 मिनट
▶अन्धकासुर की कथालगभग 2 मिनट
▶मंगलनाथ की कथालगभग 1 मिनट
▶ऋषि पिप्पलाद की कथालगभग 5 मिनट
▶भगवान शिव ने भगवान ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दियालगभग 3 मिनट
▶विष्णु और ब्रह्मा के बीच महायुद्धलगभग 3 मिनट
▶बाणासुर की कथालगभग 2 मिनट
▶माता अनुसईया की कथालगभग 3 मिनट
▶किरात रूप कथालगभग 2 मिनट
▶चंचुला की कथालगभग 1 मिनट
▶क्षिप्रा की उत्पत्ति कथालगभग 2 मिनटपूरी यात्रा →