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ऋषि पिप्पलाद की कथा

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 5 मिनट · The Story of Rishi Pippalad

वृत्रासुर नामक असुर ने कठोर तप कर के वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे धातु आदि से बने किसी अस्त्र अथवा शस्त्र से मारा ना जा सके । देवता भी उस से परास्त हो गए, ऐसे में वो निरंकुश होता चला गया । सृष्टि के कल्याण के लिए तब देवराज इन्द्र शिव भक्त, शल्यचिकित्सक तथा अणु वैज्ञानिक महर्षि दधीचि के पास पहुँचे । इन्द्र ने उनसे उनकी अस्थियों का दान मांगा क्योंकि उनकी अस्थियां वज्र के समान थीं तथा उनसे बनाये अस्त्र से वृत्रासुर का वध सम्भव था । महर्षि दधीचि ने बिना कोई संकोच किए सृष्टि के कल्याण हेतु अपनी अस्थियां दान दे दीं जिनसे वज्र का निर्माण कर वृत्रासुर का अन्त किया गया । महर्षि दधीचि के द्वारा किए गए इस महान दान के बाद जब उनके मांसपिण्ड का अन्तिम संस्कार किया जा रहा था तब उनकी पत्नी अपने पति के साथ सती हो गईं । चूंकि वे उस समय गर्भिणी थीं, उन्होंने अपना गर्भ एक विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में रख दिया था । इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी के शरीर का अन्त हो गया । किन्तु पीपल के कोटर में रखा गर्भ जन्म ले कर स्वयं को अकेला पा कर बहुत विचलित हुआ । उसे ना अपने माता पिता के विषय में कुछ पता था ना उसका ध्यान रखने वाला या उसे उसका परिचय बताने वाला कोई था । भूख लगने पर वह पीपल के फल खा लेता था । बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा। एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने बालक को अकेला देखकर उसका परिचय पूछा- नारद- बालक तुम कौन हो ? बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ। नारद - तुम्हारे जनक कौन हैं ? बालक- मैं नहीं जानता तब नारद ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा । और आश्चर्यचकित हो उसे बताया कि - हे बालक ! महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी । नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता ऋषि दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की आयु में हो गयी थी। बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ? नारद - तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी। बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ? नारद - शनिदेव की महादशा। इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्ते और फल को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया। देवर्षि नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार घोर तपस्या की और वरदान में अपनी दृष्टि मात्र से किसी को भी जलाने की शक्ति माँगी । वरदान मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर अपनी दृष्टि से भस्म करना शुरू कर दिया। शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे। अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए । ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वरदान मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने मांगा कि जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का दोष नहीं हो ताकि कोई और बालक मेरी तरह अनाथ ना हो। तथा मुझ अनाथ को पीपल वृक्ष ने शरण दी थी, अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाए उस पर शनि की महादशा का असर ना हो। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिए । तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनिदेव को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए । आगे चलकर पिप्पलाद महान ऋषि हुए और उन्होने प्रश्न उपनिषद की रचना की ।

ऋषि पिप्पलाद की कथा
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