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सप्तऋषि मण्डल एवं शिव स्तम्भ

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 6 मिनट · Saptarishi Mandal and Shiv Stambha

ऋषि सनातन धर्म की ज्ञान धाराओं के मुख्य स्त्रोत हैं । धार्मिक ग्रंथ, ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र, खगोल, ज्योतिष, वास्तु, योग, भाषा, अध्यात्म आदि से ले कर एक आदर्श जीवन पद्धति की स्थापना हेतु आवश्यक समस्त पक्षों को व्यवस्थित तथा संयोजित करने में ऋषि मुनियों का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। इन्हीं कारणों से वेदों में ऋषियों को धर्म का संरक्षक भी माना गया है। पद्म पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण आदि पुराणों में भी सप्तऋषियों का उल्लेख प्राप्त होता है । ऋषि परम्परा में सर्वोच्च स्थान जिन सात ऋषियों को प्राप्त है उन्हें संयुक्त रूप से सप्तऋषि कहा जाता है... जिनके नाम हैं - ऋषि भरद्वाज, ऋषि विश्वामित्र, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि गौतम, ऋषि अत्रि, ऋषि कश्यप, तथा ऋषि जमदग्नि । ये सभी ऋषि भगवान ब्रहमा के मानस पुत्र तथा महादेव के शिष्य हैं । आइये हम इन सभी सात ऋषियों का परिचय प्राप्त करते हैं - भरद्‌वाज ऋषि के पिता देवगुरु बृहस्पति तथा पुत्र द्रोणाचार्य थे। यह महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे। भगवान ब्रहमा, देवगुरु बृहस्पति एवं देवराज इंद्र के बाद ऋषि भरद्वाज चौथे व्याकरण प्रवक्ता थे । अथर्ववेद में ऋषि भरद्वाज से सम्बन्धित 23 मंत्र हैं तथा ऋग्वेद में भी भरद्वाज रचित मंत्र प्राप्त किये जाते हैं । भरद्वाज ऋषि ने व्याकरण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि विषयों पर ग्रंथों की रचना की। यंत्रसर्वस्व अर्थात्‌ विमान अभियांत्रिकी ऋषि भरद्वाज द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ है अत्यंत मान्यता प्राप्त गायत्री मंत्र के द्रष्टा है ऋषि धर्म ग्रहण करने से पूर्व विश्वामित्र बड़े पराक्रमी राजा थे जिन्होंने अद्भुत तपोबल से महर्षि की उपाधि अर्जित की थी । विश्वामित्र की तपश्चर्या का बल इतना था कि उन्होंने एक पृथक सृष्टि की सर्जना आरम्भ कर दी थी. धर्म ग्रहण करने से पूर्व विश्वामित्र बड़े पराक्रमी राजा थे जिन्होंने अद्भुत तपोबल से महर्षि की उपाधि अर्जित की थी । श्रीता युग में श्री राम और लक्ष्मण के गुरु थे तथा वे ही दशरथपुत्रों को अपने साथ देवी सीता के स्वयंवर में ले कर गए थे। ३. महर्षि वशिष्ठ सुर्यवंश के राजगुरु थे । भगवान राम तथा उनके भाईयों को शिक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ के ही आश्रम में भेजा गया था । महर्षि विश्वामित्र ने क्रोध व अहंकार में महर्षि वशिष्ठ के सौ पुत्रों को मार दिया था । किन्तु फिर भी महर्षि वशिष्ठ तथा माता अरंधति ने विश्वामित्र को क्षमा कर दिया था। त्रेतायुग के अंत में महर्षि वशिष्ठ ब्रहमलोक चले गए किन्तु सप्तऋषियों के तारामंडल मैं आज भी उनकी स्थिति मानी जाती है। ४: वैदिक काल के मंत्रदष्टा ऋषि गौतम के नाम से अनेक मंत्र ऋग्वेद में प्राप्त होते हैं । हनुमान जी की माता अंजनी गौतम ऋषि और अहल्या की पुत्री थीं। जब ऋषि गौतम ने अपनी पत्नी अहल्या को कुपित हो श्राप देकर शिला में परिवर्तित कर दिया था तब श्री राम की कृपा से माता अहल्या ने पुनः अपना सजीव रूप प्राप्त किया था। गोदावरी नदी को महर्षि गौतम के तपोबल से ही गोतमी नाम प्राप्त हुआ है । ५. ऋग्वैदिक ऋषि अत्रि का उल्लेख रामायण में प्राप्त होता है राम वनवास के समय अत्रि ऋषि के आश्रम गए थे। अत्रि ऋषि की पत्नी सती अनुसूया, जोसोलह सतियों में से हैं उन्होंने अपने तपोबल से ब्रहमा, विष्णु तथा महेश को शिशु बना दिया था। तदुपरांत भगवान ब्रहमा चंद्रदेव , विष्णु जी भगवान दत्तात्रेय और अगवान शिव ऋषि दुर्वासा के रूप में सती अनुसूया और अत्रि ऋषि के पुत्र हुए। ६. महर्षि कश्यप का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है, ऐतरेय ब्राहमण में इनका संबंध जन्मेजय से बताया गया है । महर्षि कश्यप का विवाह दक्ष प्रजापति की 17 कन्याओं से किया गया। उनकी आदिती नामके पत्नी से समस्त देवगण, दिति नामक पत्नी से दैत्यगण तथा शेष पत्नियों से विभिन्‍न जीवों की सृष्टि हुई । इस प्रकार महर्षि कश्यप सृष्टि के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका रखने वाले ऋषि हुए। महर्षि जमदग्नि का आश्रम हरियाणा के जाजनपुर गांव में था । महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम हुए । महर्षि जमदग्नि के आश्रम में इच्छित फल प्रदान करने वाली एक गाय थी जिसे हम कामधेनु के नाम जानते हैं । राजा कार्तवीर्य अर्जुन राजदम्भ में उस गाय को छीन कर अपनी राजधानी माहिष्मति ले गया तभी था, जब पुत्र परशुराम को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कार्तवीर्य को युद्ध में परास्त कर मृत्यु प्रदान की तथा कामधेनु गाय वापस आश्रम में ले आये।

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