शिव अवतार ›पट्टिका 314 · पड़ाव 47 / 141

भैरव मंडपम

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 6 मिनट · Bhairav Mandapam

अब आप भैरव मंडपम पर आगये है यहाँ आपको देखने को मिलेंगे :- बटुक भैरव- 'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मनः । ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।' अर्थात् ब्रह्मा विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी मानी जाती है। बटुक भैरव भगवान शिव का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। इनका स्वरूप सौम्य है। सद्-गृहस्थ प्रायः बटुक भैरव की उपासना ही करते हैं, जबकि श्मशान साधक काल भैरव की । मान्यता है कि प्राचीन काल में एक आपद् नामक राक्षस था। जिसने कठोर तपस्या करके यह वर प्राप्तकर लिया कि उसकी मृत्यु केवल पाँच वर्ष के बालक से ही हो सकती है और वह किसी अन्य प्राणी से नहीं मारा जा सकता है। इसके बाद उसने तीनों लोकों में आतंक फैला दिया। ऐसे में जब सभी देवता इस समस्या का समाधान खोजने पर विचार कर रहे थे तभी उन देवताओं के शरीर से एक-एक तेजोधारा निकली और उससे एक पंचवर्षीय बटुक की उत्पत्ति हुई, जिसमें अद्भुत तेज था। इसी बटुक ने फिर बाद में आपद् नामक राक्षस का वध किया और आपदुद्धारक बटुक भैरव के नाम से जाने गये। क्रोध भैरव- क्रोध भैरव का वर्ण महादेव के कंठ के समान नीला है । गरुड़ की सवारी करने वाले क्रोध भैरव की आराधना उपासक को सघर्ष करने की क्षमता प्रदान करती है ऐसी मान्यता है । क्रोध भैरव का प्रमुख मंदिर भारत के तमिलनाडु में स्थित है। संमहार भैरव- मान्यता है कि संहार भैरव प्राणी को उसके द्वारा किए गए बुरे कर्मों के फल से मुक्त कर उसे सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं पर विजय पाने में मार्गदर्शन करते हैं। संहार भैरव का वर्ण रक्तिम आभायुक्त है। इन्हें उत्तर-पूर्व दिशा का संरक्षक माना जाता है। वाराणसी में संहार भैरव का प्राचीन मन्दिर स्थित है । संहार भैरव: मान्यता है कि संहार भैरव प्राणी को उसके द्वारा किए गए बुरे कर्मों के फल से मुक्त कर उसे सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं पर विजय पाने में मार्गदर्शन करते हैं। रुरु भैरव- भैरव का रुरु रूप अत्यंत प्रभावी व आकर्षक है। उनके हाथों में पात्र व् तलवार तथा उनकी कमर में एकसर्प लिपटा हुआ है ।रुरु भैरव बैल पर सवारी करते हैं और इनकी पूजा से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार रूरु भैरव की उत्पत्ति श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से हुई थी। भैरवजी का यह रूप विशेष तौर पर संपत्ति, धन और समृद्धि प्रदान करने वाला है। महाकाल भैरव - उज्जैन का कालगणना से सम्बंध वैज्ञानिक रूप से निर्विवादीत है। यहाँ भगवान महाकाल तथा कालभैरव की स्थापना इस तथ्य को अन्य तरह से भी प्रमाणित करती है। काल भैरव उज्जैन के क्षेत्रपाल माने जाते हैं। स्कंद पुराण के अवंति खंड में काल भैरव मंदिर का उल्लेख प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव अष्टमी का पर्व मनाया जाता है, जो उज्जैन का एक प्रमुख धार्मिक आयोजन है । भैरव के इस रूप को उपासक अपने समस्त दुर्गुण तथा तामसी वृत्ति अर्पित कर धर्म का आचरण करने में प्रवृत्त्त होते है। भीषण भैरव - भीषण भैरव एक महत्वपूर्ण देवता हैं जिनकी पूजा वाराणसी में मुख्य रूप से की जाती है। भीषण भैरव को भगवान शिव का उग्र रूप माना जाता है। "भीषण" शब्द का अर्थ "भयानक" या "डरावना" है। भीषण भैरव के लिया मान्यता है कि वे परिस्थिति अनुसार भयानक अथवा परोपकारी होने का सामर्थ्य रखते हैं।चण्ड भैरव - चण्ड भैरव श्वेत वर्णी हैं और उनके तीन नेत्र हैं। उनके एक हाथ में तलवार, दूसरे में पात्र, तीसरे में तीर और चौथे में धनुष है। चण्ड भैरव दक्षिण दिशा के स्वामी है, मृगशिरा इनका नक्षत्र और रत्न मूंगा है। सुब्रमण्यम या कार्तिकेय की तरह, चंडभैरव का भी वाहन मोर है। तमिलनाडु में वैठीश्वर नामक इनका प्रमुख मंदिर है। चण्ड भैरव अष्टभैरवों में तीसरे हैं।असितांग भैरव - असितांग भैरव कलात्मक गुणों के दाता व् संरक्षक देवता है। तीन नेत्रों वाले असितांग भैरव की सवारी हंस है। व इनका का वर्ण श्याम है। असितांग भैरव: असितांग भैरव का प्रैरव कलात्मक गुणों के दाता व्‌ संरक्षक देवता है। व इनका का वर्ण श्याम है। कपाल भैरव - कपाल भैरव का जन्म ब्रह्मकपाल से हुआ माना जाता है। । भैरव इस रूप में समस्त संसार के कपाल और उनमे आने वाले विचारों के देवता हैं। तंत्र में इनकी आराधना मुख्य रूप से की जाती हैं। तंत्र में सिद्धि की पराकाष्ठा कपाल भेदन क्रिया को माना जाता हैं। इस रूप में भैरव हाथी पर सवार हैं और उनकी मातृका इंद्राणी है। इनकी दिशा उत्तर पश्चिम अर्थात वायव्य कोण है और नक्षत्र भरणी है।

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