भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर का वध
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Shiva Slays Tripurasura
त्रिपुरासुर की कथा महाभारत के कर्णपर्व में प्राप्त होती है। शिव पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर का वध करने के बाद उसके पुत्रों ने देवताओं से प्रतिशोध लेने का प्रण किया। उसके पुत्र थे तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष जिन्हें सम्मिलित रूप से त्रिपुरासुर कहा जाता था । वे जानते थे कि देवताओं से प्रतिशोध के लिए उन्हें अत्यधिक सामर्थ्यवान होना होगा। इसके लिए उन्होंने सहस्त्रों वर्षों तक अत्यंत दुष्कर तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें तीन अलग-अलग अभेध्य नगर बसाने का वरदान दिया। वरदान पाकर तीनों ने दानवों के वास्तुविद मयदानव से अपने लिये क्रम से सोने, चाँदी ओर लोहे के तीन नगर बनवाए। ये ही तीन नगर 'पुर' या 'त्रिपुर' कहलाए। ब्रह्मा ने यह भी कहा था कि सहस्रों वर्षों के बाद ये तीनों नगर एक में मिल जायँगे और तब जो एक बाण से ही तीनों पुरों को नष्ट कर सकेगा, वही तीनों भाइयों का काल सिद्ध होगा। वरदान पा कर कुछ समय सदाचार से बिताने के बाद त्रिपुरासुर सनातन धर्म से विमुख होकर सर्वथा अनाचारपरायण हो गये। वैदिक धर्मका नाश होने से त्रिपुरासुर द्वारा स्थापित त्रिपुर में पुरुष इन्द्रियों के वश हो गये । देवाराधन, श्राद्ध, यज्ञ, व्रत, तीर्थ, शिव-विष्णु-सूर्य- गणेश आदि का पूजन, स्नान, दान आदि सभी शुभ आचरण नष्ट हो गये। माया तथा अलक्ष्मी उन पुरों में जा पहुँची । तप से प्राप्त लक्ष्मी वहाँ से चली गई और वहाँ अधर्म का विस्तार हो गया तब सत्पुरुषों ने ब्रह्मा जी से इस विषय पर करुण पुकार की। ब्रह्मा जी ने कहा कि चूँकि मैंने ही उन दैत्यों को वर दिया है, अतः मेरे हाथों उनका वध उचित नहीं होगा, इन्द्र सहित सभी देवता शिवजी से इस हेतु प्रार्थना करें।












