सप्तर्षि ›पट्टिका 417 · पड़ाव 58 / 141

महर्षि जमदग्नि

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Maharishi Jamadagni

महर्षि जमदग्नि सप्तऋषियों में छठे स्थान पर शोभित हैं । पुराणों के अनुसार महर्षि जमदग्नि के पिता भृगुवंशी ऋषि ऋचिक थे । इनका आश्रम हरियाणा में कैथल के उत्तर पूर्व जाजनपुर गांव में था । अब भी इस स्थान पर प्रत्येक मास शुक्ल पक्ष की दशमी को मेला लगता है। महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम हुए । भृगुवंशी होने से भगवान परशुराम भार्गव भी कहलाए । दक्षिण भारत के पश्चिमी तट के एक बड़े हिस्से की स्थापना भगवान परशुराम द्वारा मानी जाती है , इसीलिए इस क्षेत्र को भार्गव क्षेत्र भी कहा जाता है । पारंपरिक मार्शल आर्ट कलरीपयट्टु के गुरु भगवान परशुराम ही माने जाते हैं । महर्षि जमदग्नि के आश्रम में इच्छित फल प्रदान करने वाली एक गाय थी जिसे हम कामधेनु के नाम जानते हैं । राजा कार्तवीर्य राजदम्भ में उस गाय को छीन कर अपनी राजधानी माहिष्मति ले गया था , जब भगवान परशुराम को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कार्तवीर्य को युद्ध में परास्त कर मृत्यु प्रदान की तथा कामधेनु गाय वापस आश्रम में ले आये। इस तरह और भी आततायी और मदान्ध शासकों को भगवान परशुराम ने परास्त कर शासन में धर्माचार का मार्ग प्रशस्त किया । पौराणिक आख्यान है कि किसी कारणवश ऋषि जमदग्नि अपनी धर्मपत्नी रेणुका पर अत्यधिक कुपित हो गए थे , जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने तत्काल अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दिया । किन्तु किसी पुत्र ने उनके आदेश का पालन नहीं किया । भगवान परशुराम ने अपनी पितृभक्ति के कारण पिता के आदेश को शिरोधार्य करते हुए फरसे से माँ का सिर धड़ से अलग कर दिया। तब पुत्र की आज्ञाकारीता से प्रसन्न हो पिता ने वर मांगने को कहा, भगवान परशुराम ने वरदान में अपनी माता का जीवन मांगा । महर्षि जमदग्नि ने अपने तपोबल से देवी रेणुका को पुनः जीवित कर दिया ।

महर्षि जमदग्नि
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