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नीलकंठ महादेव और समुद्र मंथन

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 4 मिनट · Neelkanth Mahadev and Samudra Manthan

आप अपने समक्ष समुद्र मंथन के साथ नीलकंठ महादेव को देख रहे हैं। यूँ तो समुद्र का मंथन किए जाने के प्रसंग से अधिकतर लोग अवगत है किंतु समुद्र मंथन की मुख्य तथा विस्तृत कथा इस प्रकार है- भारत वर्ष में अनेक महान ऋषि हुए। इनमें एक ऋषि थे- ऋषि दुर्वासा, जो अपने क्रोधी स्वाभाव के लिए ख्यात थे। छोटी छोटी बात पर क्रुद्ध होकर शाप देने की उनकी अनेक कथाएं प्राप्त होती है। एक बार इंद्र देव ने अंहकारवश दुर्वासा ऋषि द्वारा भेंट की गई वैजयन्ती माला को अपने हाथी एरावत को पहना दिया था। जिसे ऋषि ने अपना अपमान मानते हुए देवराज इंद्र को शाप दे दिया कि देवता श्री हीन और बल हीन हो जाएं। देवताओं की यह गति देखकर दैत्यों ने इसे अपने लिए सुअवसर माना और देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता हार गए और विष्णु जी के पास पहुंचे। विष्णु जी ने उन्हें सुझाव दिया कि अभी आप शापित भी हैं और आपका समय भी ठीक नहीं है इसलिए आप पहले समुद्र मंथन से अमृत को प्राप्त करके अपने आप को सुरक्षित करें। उसके लिए आप दैत्यों से मिलकर संधि करे, और मिलकर अमृत प्राप्त करें। इसमें मैं भी आपका सहयोग करूंगा। देवताओं ने दैत्यों को अमृत का प्रलोभन दिया और दोनों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथनी बनाकर वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। मंदराचल का भार वहन करने और समुद्र में नीचे जाने से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने कच्छप का रूप लेकर अपनी पीठ का आधार दिया। समुद्र मंथन आरम्भ हुआ । मंथन से सर्वप्रथम कालकूट विष निकला जिसके विषैले प्रभाव से संसार त्राहि-त्राहि करने लगा। तब समस्त देव गण व् असुर सृष्टि संतुलन की प्रार्थना लेकर महादेव शिव के पास पहुँचे। भगवान भोले नाथ ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर भयानक विष को अपने कंठ में स्थान दिया और इस तरह सृष्टि प्रलयकारी विष के प्रभाव से बची तथा शिव नील कंठ हुए। उसके बाद पुन: समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ जिसमे कुल 14 रत्न प्राप्त हुए जिनका आपसी सहमति से देवों तथा असुरों के बीच बंटवारा हुआ। अंत में अमृत कलश प्रकट हुआ। उसको देखते ही देवों- दानवों में परस्पर प्रतिस्पर्धा होने लगी। तब तत्काल विष्णु जी ने मोहिनी रूप धरकर दानवों को अपने विश्वास में लेकर समान भाग से अमृत वितरण करने का दायित्व ले लिया और मोहिनी पर मुग्ध दैत्यों ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। मोहिनी ने बड़ी कुशलता से देवताओं को एक पंक्ति में बिठाकर अमृत पान करना शुरू किया लेकिन एक दैत्य ने इस षड़यंत्र को समझ लिया। और वह भी देवता का रूप धर कर उनकी पंक्ति में जा बैठा। मोहिनी में देवता बन कर बैठे इस दैत्य को भी समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का पान कर दिया। तभी सूर्यदेव तथा चन्द्रदेव ने उसे पहचान लिया और मोहिनी बने भगवान विष्णु को बता दिया। भगवान विष्णु को उस दैत्य के इस कृत्य पर भयानक रोष आया और उन्होंने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया। किंतु अमृत के प्रभाव ने उसे अमर कर दिया था। अतः वो दो टुकड़ों में कट कर भी जीवित रहा। और देव कृपा से वो अंतरिक्ष में दो ग्रहों के रूप में स्थापित हुआ। अपने साथ हुए विश्वासघात से क्रुद्ध दैत्यों ने देवताओं पर अक्रमण कर दिया। किंतु वे परास्त हुए। और अहंकार से ग्रस्त देवराज इंद्र, जो महर्षि दुर्वसा के शाप से श्रीहीन हुए थे, उन्हें पुनः इंद्रासन प्राप्त हुआ। यह कथा हमें अहंकार आदि दुर्गुणों से स्वयं को मुक्त रखने के लिए आत्म मंथन की प्रेरणा देती है।

नीलकंठ महादेव और समुद्र मंथन
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