भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 4 मिनट · The Birth of Lord Kartikeya
स्कंद पुराण के अनुसार शिव वरदान से गर्वित तारकासुर अत्यंत विनाशकारी और अधर्मी हो गया था । और प्राप्त वरदान के अनुसार शिवपुत्र ही उसका वध कर सकता था इसलिए देवगण, ऋषि और मुनि, भगवान ब्रह्मा तथा श्री विष्णु के पास अपनी व्यथा लेकर पहुंचे। भगवान ब्रह्मा और श्री विष्णु ने शिवजी के पास जाकर पुत्र उत्पन्न करने के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव ने उन्हें आश्वस्त किया। फिर भगवान शिव और देवी पार्वती ने आध्यात्मिक मिलन से एक दिव्य ऊर्जा उत्पन्न की। यह ऊर्जा उनके पुत्र के जन्म के लिए आवश्यक थी। यहां तक कि देवता भी शिव पार्वती पुत्र के जन्म की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे थे क्योंकि तारका सुर को प्राप्त वरदान के अनुसार उसकी मृत्यु शिव तथा पार्वती के पुत्र के ही हाथों सम्भव थी । अतः वह इनके मिलन और पुत्र प्राप्ति में यथा सम्भव बाधाएं खड़ी कर रहा था । जैसे ही शिव पार्वती के मिलन से उत्पन्न उर्जा का समाचार तारकासुर तक पहुँचा, उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और भगवान शिव और पार्वती के पुत्र के जन्म को रोकने के लिए उत्पन्न ऊर्जा को भी नष्ट करना चाहा। देवताओं के प्रमुख इन्द्र ने उर्जा की रक्षा के लिए ऊर्जा वहन करने में सक्षम अग्नि देव को भेजा। अग्निदेव ने भगवान शिव और पार्वती की अनुमति के बिना उस ऊर्जा को चुरा लिया और उस स्थान से निकल भागे ताकि उसे राक्षसों से बचाया जा सके। किन्तु ऊर्जा अत्यधिक तीव्र थी, स्वयं अग्निदेव भी उस ऊर्जा से उत्पन्न ताप को सहन करने में विफल रहे और अपने प्राण बचाने के लिए जलराशि की ओर भागे। जब देवी पार्वती को ऊर्जा की हानि के बारे में पता चला, तो वह देवताओं पर अत्यधिक क्रोधित हुई। उनका मातृत्व आहत हुआ और वे अपने कोप की चरम अवस्था पर पहुंच गई। अपने निजी विषय में देवताओं के हस्तक्षेप से कुपित देवी ने देवताओंको शाप दिया कि उनकी पत्नियों गर्भधारण नहीं कर पाएंगी। उन्होंने अग्निदेव को भी शाप दिया कि जो कोई भी उन्हें छूएगा वह जलकर भस्म हो जाएगा । शाप ने जल्द ही अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। अग्नि देव ने अपनी सहायता के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। आशुतोष शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और बोले कि पार्वती के श्राप के सक्रिय होने के बाद भी अग्निदेव पवित्र ही रहेंगे और जो भी उनके द्वारा जलकर भस्म हो जाएगा वह भी पवित्र हो जाएगा। उस दिन से अग्नि की पवित्रता के कारण उन्हें भगवान शिव से अपना नया नाम 'पावक" मिला। अग्नि देव ने शिवजी का वीर्य और देवी की तेजोमय शक्ति से उत्पन्न ऊर्जा लेकर देवी गंगा को सौंप दी। बहते बहते वह ऊर्जा छ भागों में विभाजित हो गया । तथा सुंदर शिशुओं में परिवर्तित हो गई। उस वन में विचरण करने वाली 6 कृतिका कन्याओं की दृष्टि जब उन सुकुमार शिशुओं पर पड़ी तब उनका मातृत्व भाव जागृत हो गया । और उन्होंने अमृत पान करा के उन शिशुओं का पोषण किया । कुछ समय पश्चात देवर्षि नारद से भगवान शिव तथा देवी पार्वती को कृतिका वास में रह रहे अपने पुत्रों का रहस्य जात हुआ । अपने पुत्रों से मिलने की इच्छा से माता-पिता कृतिका वास गए और उत्साहित होकर अपने पुत्रों से मिले । देवी अरुंधती ने शिव जी की अनुमति से उन 6 पुत्रों को एकमेक कर एक बालक बना दिया । किन्तु उस बालक के मुख 6 ही रहे । भगवान शिव और देवी पार्वती ने कृतिकाओं को आभार परस्तित किया तथा उनकी अनुमति से वे अपने उस पुत्र को कैलाश पर्वत ले आए । कृतिकाओं द्वारा पालन पोषण किए जाने के कारण बालक का नाम कार्तिकेय पड़ा ।

▶देवी पार्वती ने अग्नि देव को श्राप दियालगभग 1 मिनट
▶छह कृतिकाओं ने एक बालक को जन्म दियालगभग 1 मिनट
▶श्री गणेश कथालगभग 5 मिनट
▶ब्रह्मा ने त्रिपुरासुर राक्षस को वरदान दियालगभग 2 मिनट
▶ब्रह्मा और ऋषि त्रिपुरासुर के कारण अपनी कठिनाई पर चर्चा करने आएलगभग 1 मिनट
▶अन्धकासुर की कथालगभग 2 मिनट
▶मंगलनाथ की कथालगभग 1 मिनट
▶ऋषि पिप्पलाद की कथालगभग 5 मिनट
▶भगवान शिव ने भगवान ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दियालगभग 3 मिनट
▶विष्णु और ब्रह्मा के बीच महायुद्धलगभग 3 मिनट
▶बाणासुर की कथालगभग 2 मिनट
▶माता अनुसईया की कथालगभग 3 मिनटपूरी यात्रा →