शिव अवतार ›पट्टिका 452 · पड़ाव 88 / 141

शरभ अवतार

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Sharabha Avatar

शरभावतार की कथा लिंगपुराण में प्राप्त होती है। इस कथा के अनुसार जब असुर हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया था तब हिरण्यकश्यपु का अन्त कर देने के बाद भी श्री हरि विष्णु शान्त नहीं हो पा रहे थे। उनकी क्रोधाग्नि के कारण उनके कार्यभार तथा सृष्टि संतुलन प्रभावित हो रहे थे। ऐसे में देवताओं का चिंतित हो जाना स्वाभविक था। देवगण तब भगवान शिव के पास अपनी चिंता ले कर पहुंचे और बोले- महादेव, सृष्टि के पालक शान्ताकारम श्री विष्णु भयानक रूप धारण किए हुए हैं, उन्हें नरसिंह रूप से मुक्त करा के सृष्टि का रक्षण करें। तब भगवान शिव नरसिंह रूपधारी श्री विष्णु के समक्ष जा कर उन्हें सामान्य स्वरुप में आने का अनुरोध करने लगे। किन्तु श्रीहरि की क्रोधाग्नि शान्त नहीं हो रही थी। यह देखकर भगवान शिव ने नरसिंह से भी अधिक भयंकर अवतार धारण किया। यह शरभअवतार था । शरभावतार शिव का आधा शरीर मृग तथा शेष शरीर शरभ का था। शरभ पुराणों में वर्णित एक काल्पनिक प्राणी है जिसके आठ पैर हैं, गरुड़ की भान्ति विशाल पंख हैं तथा जो सिंह से भी अधिक शक्तिशाली है। यह शरभ अवतार इतना भीषण था कि उसने उड़कर श्री विष्णु के नरसिंह रूप को अपने पंजे में जकड़ लिया तथा उनके पैरों को अपनी पूंछ से बान्ध दिया। नृसिंह रूपी श्री विष्णु तुरंत ही शान्त हो कर अपने कल्याणकारी रूप में लौट आए। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की। सृष्टि के कल्याण हेतु शरभअवतार लेने वाले आशुतोष शिव ने उन्हें अभय प्रदान किया ।

शरभ अवतार
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