महर्षि वशिष्ठ ने चंद्रभागा नदी के तट पर संध्या को तपस्या के लिए दीक्षित किया
🎧 ऑडियो कथा · लगभग 7 मिनट · Vashistha Initiates Sandhya Into Penance
परमपिता ब्रह्मा ने सृष्टि के आदिकाल में मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वशिष्ठ, नारद, दक्ष और भृगु नामक मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके हृदय से एक अत्यंत मोहक नारी भी उत्पन्न हुई जिसका नाम सन्ध्या था। देवी संध्या दिन में क्षीण रहती और सायंकाल में निखर उठती थीं। वह सात्विक प्रवृत्ति की थीं और निरन्तर मंत्रजाप करती रहती थी। किन्तु एक बार उनके मन में सकाम भाव आ गया। तब ग्लानिवश उन्होंने निश्चय किया कि संसार में तरुणावस्था से पूर्व किसी भी प्राणी में कामभाव ना आए इसके लिए मैं कठोर तपस्या करके मर्यादा स्थापित करूंगी। ऐसा विचार करके देवी सन्ध्या चंद्रभाग नामक पर्वत पर चली गई। यह जान कर ब्रह्माजी ने अपने विद्वान् एवं ज्ञान-योगी पुत्र वशिष्ठ से कहा- पुत्र वशिष्ठ! मनस्विनी सन्ध्या तपस्या की इच्छा से चंद्रभाग पर गई है, पर अभी वह तपस्या के भाव को नहीं जानती है। तुम जाओ और उसे विधि पूर्वक दीक्षा दो। चंद्रभाग पर्वत पर बृहलोहित सरोवर के किनारे बैठी हुई देवी सन्ध्या को देखकर महर्षि वशिष्ठ ने पूछा- भद्रे! तुम इस निर्जन पर्वत पर क्यों आई हो? महात्मा वशिष्ठ की यह बात सुनकर देवी सन्ध्या ने उनकी ओर देखा । उन्हें देखकर उसे ऐसा लगा मानो ब्रहमचर्य देह धारण कर सामने प्रकट हो गया हो। देवी सन्ध्या ने प्रणाम करते हुए कहा- मेरा नाम सन्ध्या है। मैं तपस्या करने के लिए इस पर्वत पर आई हूँ, कृपया मुझे तपस्या की विधि बताएं। महर्षि वशिष्ठ जी बोले- जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के आदि कारण हैं, उन अद्वितीय पुरुषोत्तम शिव का ध्यान करते हुए "ऊँ नमः शंकराय" इस मंत्र का निरंतर जप करते हुई तपस्या आरंभ करो ध्यान मैं रहते हुए ही महादेव की पूजा करनी होगी, प्रथम दो दिवस छठे प्रहर में केवल जल ग्रहण करना है। तीसरी बार छठे प्रहर में पूर्ण उपवास करना। इसी क्रम का पालन तपस्या की समाप्ति तक करना। इस प्रकार की जाने वाली मौन तपस्या ब्रहमचर्य प्रदान करती है तथा संपूर्ण मनोरथों की पूर्ति करती है। इस तरह देवी सन्ध्या को तपस्या करने की विधि बता कर महर्षि वशिष्ठ अंतर्धान हो गए। तब देवी संध्या तप के विधान को ध्यान से समझ कर तपस्या करने लगीं। तपस्या में लीन हुए उन्हें चार युग बीत चुके थे। एक दिन महादेव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर उन्हें दर्शन दिए। अपने आराध्य को सामने देख कर देवी सन्ध्या अभिभूत हो गई और बोलीं- निर्मल, निर्विकार, नित्यप्रसन्न भगवान शिव को मैं प्रणाम करती हूँ।महेश्वर शिव ने कहा- भद्रे! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ । अत्यंत शुद्ध बुद्धि देवी संध्या अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगों हर्षित हो कर वे बोलीं - देवेश्वर ! मेरा पहला वर ये है कि इस अनंत आकाश में तथा पृथ्वी में जितने भी प्राणी हैं उनमें से कोई भी बाल्यावस्था और कौमारावस्था में काम भाव से युक्त ना हो, मेरी दृष्टि सकाम हो कर कहीं ना पड़े, जो पुरुष मेरे पति हों वे शुद्ध हृदय के स्वामी हों, पति के अलावा जो भी पुरुष मुझे काम भाव से देखें उसके पुरुषत्व का नाश हो कर वो तत्काल ही नपुंसक हो जाए। भक्त वत्सल भगवान शंकर ने कहा- भद्रे ! तुम्हारी तपस्या से संतुष्ट होकर मैं तुम्हारे द्वारा वांछित सभी वर प्रदान करता हूँ। जब देवी सन्ध्या चंद्रभाग पर्वत पर चार युगों तक कठोर तपस्या कर रही थी उन्हीं दिनों सतयुग बीत जाने पर त्रेता के प्रथम भाग में प्रजापति दक्ष के घर कन्याएं हुईं। उन्होंने अपनी उन सुशील कन्याओं का यथायोग्य विवाह किया। सत्ताईस कन्याओं का विवाह उन्होंने चंद्रमा के साथ किया । किन्तु चन्द्रमा अपनी अन्य सब पत्नियों में से सर्वाधिक प्रेम रोहिणी से करते थे । अपनी अन्य पुत्रियों के प्रति इस भेदभाव से प्रजापति ने क्रोधित हो कर अपने जामाता चन्द्र को शाप दे दिया। चंद्रमा को शाप से मुक्त करने के लिए एक नदी की सृष्टि की गई, जो बाद में चंद्रभागा नदी के नाम से विख्यात हुई। चंद्रभागा के प्रादुर्भाव काल में वहाँ मुनि मेधातिथि उपस्थित हुए। उन्होंने वहां ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ आरंक्ष किया । उस यज्ञ की वेदी में अग्निदेव अपने पूर्ण प्रखर रूप में प्रज्वलित हो रहे थे। देवी संध्या ने कामभाव से ग्रसित हो जाने की ग्लानि में अपने संकल्प के अनुसार स्वयं को उस अग्नि को समर्पित कर दिया । मान्यता है कि देवी संध्या के ही शरीर का ऊपरी आधा भाग प्रातः सन्ध्या के रूप में तथा नीचे का भाग सायं सन्ध्या के रूप में आकाश में सौंदर्य की सृष्टि करता है। यज्ञ की समाप्ति होने पर यज्ञ की अग्नि से महर्षि मेधातिथि को तपे हुए स्वर्ण की सी कांति वाली पुत्री प्राप्त हुई। उन्होंने बड़े आमोद के साथ उस पुत्री को स्वीकार किया। तथा उसका नाम अरुन्धती रखा। देवी अरुन्धती चंद्रभागा नदी के तट पर मुनिवर मेधातिथि के उस आश्रम में धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं। जब वे विवाह के योग्य हो गईं। तब ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर ने ऋषि वशिष्ठ के साथ उनका विवाह करा दिया। अपने गृहस्थ धर्म का पालन अरुन्धती ने सम्पूर्ण आदर्शों का पालन करते हुए किया तथा एक अत्यंत सुखद व सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत किया। इसीलिए आज भी विवाह के समय अरुन्धती नक्षत्र का दर्शन दंपत्ति के लिए शुक्ष माना जाता है ।

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