उज्जैन इतिहास ›पट्टिका 633 · पड़ाव 140 / 141

राजा भोज

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Raja Bhoj

राजा भोज का नाम धार से जुड़ा हुआ है किन्तु उनका जन्म सन् 980 में उज्जयिनी में हुआ. वे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के वंशज थे. सिंहासन बत्तीसी की कहानी इन्हीं राजा भोज से सम्बन्धित बताई गई है और यहां भी वे उज्जैन के राजा के रूप में ही दर्शाए गए हैं जिन्हें पता चलता है कि उनके राज्य में एक साधारण -सा अनपढ़ चरवाहा अपनी न्यायप्रियता के लिए विख्यात है। वे स्वयं भेष बदलकर उस चरवाहे को एक जटिल मामले में पूरे आत्मविश्वास से फैसला करते देखते हैं। बाद में जब वह चरवाहा बताता है कि यह क्षमता उसमें एक टीले पर चढ़कर बैठने से आती है। तो राजा भोज उस टीले को खुदवाते हैं, एक राजसिंहासन मिट्टी से प्रकट होता है, उसे स्वच्छ करवाकर राजा भोज जब उस पर बैठने के लिए उद्यत होते हैं। तो उसमें जड़ी बत्तीस पुतलियां खिलखिलाने लगती हैं। फिर प्रत्येक पुतली राजा विक्रमादित्य के गुणों को रेखांकित करने वाली एक कहानी सुनाती है। राजा भोज स्वयं में वे गुण विकसित करते हैं और अन्ततः सिंहासन पर बैठने की नैतिकता की, परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं। यह टीला आज भी उज्जैन में है। राजा भोज को महाकाल के मंदिर निर्माण का भी श्रेय दिया जाता है और उज्जैन नगर के भी पुनर्निर्माण का भी राजा भोज ने धार और मांडव के साथ साथ उज्जैन में भी 'सरस्वती कंठा भरण भवन' बनवाया था। उज्जैन में दानी गेट के पास का शिवमंदिर उन्हीं के काल का बताया जाता है।

राजा भोज
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