उज्जैन इतिहास ›पट्टिका 634 · पड़ाव 141 / 141

कर्ण- सुदर्शन चक्र

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 3 मिनट · Karn and the Sudarshan Chakra

विश्व की एक मात्र उत्तर प्रवाहमान नदी क्षिप्रा के किनारे बसी भगवान श्रीकृष्‍ण की शिक्षा स्थली व राजाधिराज भगवान महाकाल की अवंतिका अथवा उज्जैन का तीर्थों में विशेष महत्व है। यहाँ ज्योतिर्लिंग है और शक्तिपीठ भी, यहां चौरासी महादेव के साथ ही देश का एकमात्र अष्ट चिरंजीवियों का मंदिर भी स्थित है। यह मंगलदेव की उत्पत्ति का स्थान है और कर्क रेखा का केंद्रबिंदु भी । यहां पर नव नारायण तथा सप्त सागर भी स्थित हैं। यहां देवी पार्वती द्वारा लगाया गया सिद्धवट वृक्ष है तथा चौसठ योगिनी मन्दिर भी । उज्जैन में कुम्भ पर्व का आयोजन होता है , यहां के कुंभ पर्व को सिंहस्थ कहा जाता है। राजा विक्रमादित्य ने ही यहीं से विक्रम संवत प्रारंभ किया था, जो उत्तर भारत में लोक का पंचांग बना । उज्जैन की वैज्ञानिक, पौराणिक तथा भौगोलिक महत्ता का वर्णन अनेक ग्रंथों में प्राप्त होता है । इसके महात्म्य को दर्शाता एक श्लोक स्कंद पुराण में भी प्राप्त होता है , जो इस प्रकार है - श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठं तु वनमेव च, पंचैकत्र न लभ्यते महाकाल पुरदृते। इसके अनुसार उज्जैन में पांच प्रकार के स्थान हैं - श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठ एवं वन जो एक विशेष संयोग है । ऐसा संयोग और कहीं नहीं है। उज्जैन की महिमा अपार है, यहां के शमशान को भी तीर्थ कहा गया है । इनमें सबसे प्राचीन व प्रमुख श्मशान है चक्रतीर्थ । इस सिद्ध क्षेत्र के संबंध में जो कथा प्रचलित है वह अत्यंत रुचिकर है । मान्यता है कि उज्जैन स्थित चक्रतीर्थ वह स्थान है जहां महादानी सूर्यपुत्र कर्ण का मृत्यु उपरांत अग्निदाह स्वयं भगवान श्री कृष्ण द्वारा किया गया था । विस्तृत कथा के अनुसार महाभारत युद्ध में अर्जुन के हाथों परास्त होने पर महारथी कर्ण से श्री कृष्ण ने उनकी अंतिम इच्छा जाननी चाही । कर्ण ने विनीत भाव से कहा - हे वसुदेव कृष्ण ! मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार एक कुंवारी भूमि पर आपके द्वारा हो। भक्त वत्सल श्री कृष्ण ने अपनी उंगली पर शोभायमान सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि कुंवारी भूमि चिन्हित करे । तब सुदर्शन चक्र जिस स्थान पर आ कर ठहरा वही आज चक्रतीर्थ के नाम से जाना जाता है ।सूर्यपुत्र कर्ण की अन्तिम इच्छा का सम्मान करते हुए श्रीकृष्ण ने यहीं उनका अन्तिम संस्कार कर मोक्ष प्रदान किया ।

कर्ण- सुदर्शन चक्र
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