शिव अवतार ›पट्टिका 475 · पड़ाव 104 / 141

कृष्णदर्शन अवतार

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 5 मिनट · The Krishnadarshan Avatar

मनु के इक्ष्वाकु आदि जो पुत्र थे उनमें नवम पुत्र का नाम नाभाग था। मनु पुत्र नाभाग बड़े बुद्धिमान थे उन्होंने विद्या अध्ययन के लिए दीर्घकाल तक गुरुकुल में निवास किया। नाभाग के अन्य भाइयों ने अपने पिता की आज्ञा से संपूर्ण संपत्ति का बंटवारा कर लिया और नाभाग को कोई भी हिस्सा नहीं दिया । कुछ काल के पश्चात् ब्रह्मचारी नाभाग गुरुकुल से वेदों का अध्ययन करके आए तो उन्होंने देखा सारे भाई संपत्ति का बंटवारा कर चुके हैं। नाभाग ने बड़े स्नेह से अपने भाईयों से कहा- मेरे लिए जो भाग है आप लोग मुझे वह भाग दे दीजिए, मैं अपना भाग लेने के लिए यहां आया हूं । तब भाई बोले अब संपत्ति का बंटवारा हो चुका है, तुम्हारे हिस्से में बस पिताजी हैं, तुम उन्हीं को अपना भाग समझो। भाईयों के वचन सुनकर नाभाग अपने पिताजी के पास गए और भाईयों के द्वारा कही गई बात पिताजी को बताई कि उन्होंने मुझे आपको ही अपने हिस्से में बताया है अतः मैं आपकी सेवा के लिए आया हूं। नाभाग की बात सुनकर पिता को उस पर अत्यंत स्नेह आया किन्तु, उन्हें चिंता भी हुई कि उसका जीवन यापन व दायित्वों का निर्वाहन कैसे होगा। तब पिता ने कहा कि मैं तुम्हारी जीविका का एक उपाय बताता हूं- अंगिरस गौत्र वाले ब्राह्मण एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं किंतु, वह छठे दिन का कर्म सही पद्दति से नहीं कर पा रहे हैं। तुम वहां जाओ और उन ब्राह्मणों को विश्वदेव संबंधी सूक्त बताकर उनके यज्ञ को शुद्ध रूप से संपादित करो। जब यज्ञ समाप्त होगा वह ब्राह्मण स्वर्ग को प्रस्थान करेंगे। उस समय संतुष्ट होकर वे अपने यज्ञ से बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे। पिता की बात सुनकर सत्यवादी नाभाग यज्ञ में गए। मनु पुत्र ने विश्वदेव संबंधी सूक्तों का ज्ञान व कर्म उचित रूप से संपादित किया। यज्ञ समाप्त होने पर वह अंगिरस ब्राह्मण यज्ञ से बचा हुआ सारा धन नाभाग को देकर स्वर्ग लोक को चले गए। उस धन को जब वे ग्रहण करने लगे तो भगवान शिव कृष्णदर्शन रूप में तत्काल प्रकट हुए। उनके अन्य हे सुंदर थे और क्षेत्र काले थे। उन्होंने नाभाग से पूछा तुम कौन हो जो इस धन को ले जा रहे हो। यह तो मेरी संपत्ति है, तुमको यहाँ किसने भेजा? नाभाग ने कहा अब यह मेरी संपत्ति है इसको लेने से तुम मुझे कैसे रोक सकते हो? तब कृष्ण दर्शन शिव ने कहा हम दोनों के इस विवाद में तुम्हारे पिता को ही पंच बनाते हैं। उनसे जाकर पूछो और वह जो निर्णय दे मुझे यहां आ कर बताओ। तब पुत्र ने अपने पिता के पास जाकर सम्पूर्ण विवरण सुनाया। पिता ने भगवान शिव के चरण कमलों का चिंतन किया और कहा कि जो तुम्हें धन लेने से रोक रहे हैं सारे संसार की वस्तुओं पर उनका ही विशेष अधिकार है । तुम जिसपर अधिकार जान रहे हो उसे रुद्र का भाग कहा जाता है जाकर अपने अपराध के लिए उनसे क्षमा माँगो। पिता की आज्ञा से नाभाग वहां गए और भगवान को प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले- महेश्वर! यह सारी त्रिलोकी ही आपकी है, निश्चय ही इस पर आपका अधिकार है। यह मेरे पिता का निर्णय है। मैंने भ्रमित होकर आपसे जो कुछ कहा उस अपराध को क्षमा कीजिए । कृष्णदर्शन बोले- नाभाग तुम्हारे पिता ने धर्म अनुकूल बात कही है। तुम भी साधु स्वभाव के हो, मैं तुम पर प्रसन्न हूं और तुम्हें सनातन ब्रह्म तत्व का ज्ञान प्रदान करता हूं। तुम इस लोक में निर्विकार रह कर विपुल भोगों का उपभोग करोगे और अंत में मेरी कृपा से तुम्हें सद्गति प्राप्त होगी। ऐसा कह कर भगवान कृष्ण दर्शन अन्तर्धान हो गए। यह कथा हमें धैर्य व संतोष के साथ कर्तव्यपालन का संदेश देती है। ऐसा करने वाले को निश्चित ही प्रभु कृपा प्राप्त होती है।

कृष्णदर्शन अवतार
सुनेंआवाज़
Developed by Satyarth Shukla