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अंगारेश्वर महादेव

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Angareshwar Mahadev

कालगणना तथा ज्योतिशास्त्र के परिप्रेक्ष्य से महत्वपूर्ण उज्जैन क्षेत्र के उत्तरभाग में क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित यह स्थान आज अंगारेश्वर महादेव के नाम में विख्यात है। मंगलग्रह के जन्म का आख्यान स्कन्दपुराण के अवन्तिखण्ड, ब्रह्मवैवर्तपुराण तथा रूद्रयामल के भौमकल्प में प्राप्त होता है। 'उज्जयिनी' मंगलग्रह की जन्मभूमि है। इनका जन्म क्षिप्रा नदी के तट पर उत्तर दिशा में हुआ था। इसी स्थल पर अंगारेश्वर महादेव का मन्दिर हैं। पौराणिक आख्यानो में बताया जाता है कि एक समय उज्जैन पर 'अंधक' नामक दैत्य का शासन था। उसका पुत्र 'कनक' अत्यन्त क्रूर तथा महापराक्रमशाली था। एक बार कनक ने इंद्र को युद्ध के लिए ललकारा। इन्द्र तथा कनक में हुए संग्राम में कनक ने वीरगति प्राप्त की । जब अन्धक को यह ज्ञात हुआ तो उसने इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। अन्धक के भय से इन्द्र कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की शरण में पहुंचे । शरणागतवत्सल परमेश्वर शिव ने उन्हें अभयदान दिया । जब अन्धक को यह ज्ञात हुआ तो उसने कैलाश पर आक्रमण कर दिया। । शिव और अन्धक के मध्य घमासान युद्ध हुआ। उसी में शिव के मस्तक से स्वेद की बून्द पृथ्वी पर गिरी जिस से लाल आभा वाले महापराक्रमी मंगल ग्रह का जन्म हुआ । पृथ्वी से उत्पन्न प्रज्वलित अंगारों के समान रक्त वर्ण वाले नवग्रहों के बीच विराजित भगवान कार्तिकेय के अनुगत रहने वाले मंगल देव ने मस्तक पर रक्‍तचंदन धारण कर रखा था। ऋषियों इस ने लाल वर्ण के शिवपुत्र की भूमिपुत्र, अंगारक, रकतेश, भौम, मंगल आदि नामों से स्तुति कर उसे नवग्रहों में प्रतिष्ठित किया । भगवान शिव ने अपने पुत्र को विविध प्रकार के वरदान दिये । मंगल दोष संबंधित पूजा आदि के लिये इस स्थत्र का विशेष महत्व है ।

अंगारेश्वर महादेव
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