पर्व व उत्सव ›पट्टिका 602 · पड़ाव 109 / 141

पंचक्रोशी यात्रा

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · Panchkroshi Yatra

प्राचीन काल से ही मालवा क्षेत्र में भगवान शिव की आराधना होती आई हैं । भगवान शिव को समर्पित अनेक उत्सव व यात्राएं मालवा प्रांत के उजैन में आयोजित होती हैं । इनमे से कुछ यात्राओं का उल्लेख पुराणों में भी प्राप्त होता है । यहाँ दर्शित पंचक्रोशी यात्रा अथवा पंचेशानी यात्रा स्कन्द पुराण के अवन्ति खंड में वर्णित है । पंचक्रोशी शब्द दो शब्द “पंच' तथा 'क्रोशी' से बना है, पंच का अर्थ है पाँच और क्रोशी का अर्थ है 'कोस' । इसी तरह पंचशयनी बनता है पंच व ईशान से अर्थात पाँच ईशान या पाँच शिव मूल ....... रूप से पाँच कोस की इस यात्रा में पाँच शिव मंदिरो के दर्शन किए जाते थे। कालांतर में इसके मार्ग में परिवर्तन आया है किन्तु आज भी इसमें पाँच शिव मंदिरों के दर्शन किए जाते हैं । वैशाख कृष्ण दशमी पर शिप्रा स्नान व नागचंद्रेश्वर के पूजन के पश्चात यह यात्रा प्रारंभ होती है, जो 448 किमी की परिक्रमा करने के बाद कर्कराज तीर्थ में समाप्त होती है। पटनी बाजार स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर से बल माँग कर श्रद्धालुगण पिंगलेश्वर, करोहन, जैथल, एवं उंडासा से होते हुए शिप्रा तट स्थित रेती घाट पर पहुँचते है। मिट्टी के घोड़े के स्वरूप में भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर वे फिर से अपना बल वापस कर इस यात्रा का समापन करते हैं। पंचकोशी यात्रा में सभी ज्ञात अज्ञात देवताओं की प्रदक्षिणा का पुण्य इस पवित्र मास में मिलता है।

पंचक्रोशी यात्रा
सुनेंआवाज़
Developed by Satyarth Shukla