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नवरत्न पैनल- 1

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 4 मिनट · Navratna Panel 1

धन्वन्तरी- धन्वन्तरी सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक हैं। धन्वन्तरी आयुर्वेद के प्रकाण्ड विद्वान थे, वे सभी रोगों के निवारण में निष्णात थे। उन्होंने काच्य भरद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बट दिया । इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने शल्य चिकित्सा का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे। सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ऋषि विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे । आयुर्वेद के सम्बन्ध में आचार्यों का मत है कि ब्रह्माजी ने पहली बार एक लाख श्लोक के, आयुर्वेद का प्रकाशन किया था जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा। तदुपरान्त उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उन से इन्द्र ने पढ़ा । इन्द्रदेव से धन्वन्तरि ने पढ़ा और उन्हें सुन कर सुश्रुत मुनि ने आयुर्वेद की रचना की। भावप्रकाश के अनुसार आत्रेय आदि मुनियों ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया। इसके उपरान्त अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों के तन्त्रों को संकलित तथा प्रतिसंस्कृत कर चरक द्वारा चरक संहिता के निर्माण का भी आख्यान है। दूसरे नंबर पर है :- शंकु- आचार्य शंकु अथवा शंकुक महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। आख्यानों के अनुसार ये प्रसिद्ध मीमांसक शबरस्वामी के पुत्र थे। आचार्य शंकु का सम्बन्ध नीतिशास्त्र से था, इनके द्वारा रचित भुवनाभ्युद्यम् संस्कृत का अतिप्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त आचार्य वास्तु तथा स्थापत्य के ज्ञाता भी थे। तीसरे नंबर पर है :- क्षपणक- आचार्य क्षपणक बौद्धमत अथवा जैनमत को मानने वाले आचार्य थे, परन्तु अपने पाण्डित्य के कारण बिना किसी धार्मिक द्वेष के गुणग्राही सम्राट विक्रमादित्य द्वारा इन्हें अपने नवरत्नों में स्वीकृत किया गया था। आचार्य क्षपणक द्वारा महाराज विक्रमादित्य के दरबार में रहते हुए कई रचनाएं कि गई थी परन्तु इनमें केवल संस्कृत में रचित 'भिक्षाटन' तथा 'नानार्थकोष' ही वर्तमान में उपलब्ध बताए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कई ग्रन्थों में इनका नामोलेख प्राप्त होता है। और अंत में है :- वेताल भट्ट - वेताल भट्ट- वेताल भट्ट सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में एक थे। वेतालभट्ट प्राचीन भारत के संस्कृत लेखक के रूप में प्रसिद्ध थे। इनके द्वारा सोलह श्लोकों में नीति-प्रदीप (नीति-प्रदीप, शाब्दिक रूप से, आचरण का दीपक) की रचना की गई थी।नीति-प्रदीप (नीति-प्रदीप, शाब्दिक रूप से, आचरण का दीपक) की रचना की गई थी। इतिहासकारों का कहना है कि बेताल भट्ट बेताल पचीसी के प्रकांड पंडित थे। उन्हें सम्राट विक्रमादित्य और उज्जैन के श्मशान में रहने वाले बेतालों की शक्ति की पूरी जानकारी थी। इसके लिए उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य को अग्नि बेताल सिद्धि प्राप्त करने की सलाह दी थी। गुरु के सानिध्य में रहकर सिद्धि करने के चलते विक्रमादित्य सिद्धि पाने में सफल भी हुए थे। दावा किया जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने अग्नि बेताल सिद्धि के जरिए दो बेतालों को अपने वश में कर लिया था। इसका वर्णन बेताल भट्ट की रचना बेताल पचीसी में है।

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