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नवरत्न पैनल- 3

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 10 मिनट · Navratna Panel 3

घटकर्पर अथवा घटकर्पर महाराज विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक है। आचार्य घटकर्पर काव्यशास्त्र के अत्यन्त ही विद्वान तथा प्रकाण्ड मर्मज्ञ थे । उज्जैन में कालिदास के पश्चात इन्हीं का नाम काव्य विधा में लिया जाता था। जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि घटखर्पर किसी व्यक्ति का नाम नही हो सकता है। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं था। घटखर्पर के विषय में भी अल्प जानकारी ही उपलब्ध है। इनका यह नाम क्यों पड़ा, यह चिंतन का विषय है। इनके विषय में एक किंवदंती प्रचलित है। कहा जाता है कि कालिदास के साथ में रहने से ये कवि बन गए थे। इनकी यह प्रतिज्ञा थी कि जो कवि मुझे 'यमक' और “अनुप्रास' रचना में पराजित कर देगा, उसके घर वे फूटे घड़े से पानी भरेंगें। बस तभी से इनका नाम 'घटखर्पर' प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया। इनके रचित दो लघुकाव्य उपलब्ध हैं । यह काव्य 'घटखर्पर' काव्य के नाम से प्रसिद्ध है। यह दूत-काव्य है। इसमें मेघ के द्वारा संदेश भेजा गया है। घटखर्पर रचित दूसरा काव्य 'नीतिसार' माना जाता है। इसमें 21 श्लोकों में नीति का सुंदर विवेचन किया गया है। दूसरे नंबर पर है :- वराहमिहिर- वराहमिहिर महाराज विक्रमादित्य की राजसभा को शोभायमान करने वाले प्रसिद्ध विद्वान थे। आचार्य भारतीय गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री थे। वराहमिहिर ने ही अपने पंचसिद्धान्तिका नामक ग्रंथ में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वराहमिहिर बचपन से ही अत्यन्त मेधावी और तेजस्वी थे। अपने पिता आदित्यदास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। वराह मिहिर का जन्म उज्जैन के समीप कपिथा गाँव (वर्तमान कायथा) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता आदित्यदास सूर्य के उपासक थे। उन्होंने मिहिर को (मिहिर का अर्थ सूर्य) भविष्य शास्त्र पढ़ाया था। वराहमिहिर का प्रथग पूर्ण ग्रंथ सूर्य सिद्धांत था जो इरा रागय उपलब्ध नहीं है। वराह मिहिर ने पंचसिद्धांतिक ग्रंथ में प्रचलित पांच सिद्धांतों- पुलिश, रोचक, वशिष्ठ, सौर (सूर्य) और पितामह का हेतु रूप से वर्णन किया है । उन्होंने चार प्रकार के माह गिनाये हैं -सौर, चन्द्र, वर्षीय और पाक्षिक। तीसरे नंबर पर है :- वररूचि- वररुचि विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। पाणिनि के बाद, कालिदास पूर्व महाकाव्य-परम्परा में लिखने वाले वररुचि का नाम लिया जाता है। संस्कृत वाडमय के इतिहास में वररुचि के नाम से कई ग्रन्थों के नाम मिलते हैं और कुछ सूक्ति-संग्रहों, जैसे- सुभाषितावली, शार्डगधरपद्धति और सदुक्तिकर्णामृत आदि में भी अनेक पद्यों के रचयिता के रूप में उद्धृत हैं। पाणिनीय व्याकरण पर वार्तिक लिखने वाले कत्यायन को तथा प्राकृत-प्रकाश नाम के प्राकृत-व्याकरण के रचयिता को भी वररुचि नाम रो जाना जाता है। यहाँ तक, पालि भाषा का कच्चायन व्याकरण भी कात्यायन द्वारा निर्मित होने से वररुचि से जुड़ जाता है। तारानाथ ने अपने भारत में बौद्ध धर्म का इतिहास में ब्राह्मण-वररुचि या आचार्य-वररुचि को उद्धृत किया है। चर अवन्तिसुन्दरीकथासार, प्राकृतमंजरी तथा बृहत्कथा (कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी आदि) में वररुचि का नाम उद्धृत है। पतंजलि ने महाभाष्य में वररुचि द्वारा प्रणीत काव्य का निर्देश वाररुचं काव्यम्‌ कह कर किया है, किन्तु यह रचना उपलब्ध नहीं है । सूक्तिमुक्तावली में यह पद्य मिलता है- यथार्थता कथं नाम्नि मा मूद्‌ वररुचिरिह। व्यधत्त कण्ठाभरणं यरू सदारोहणप्रियरू। । चौथे नंबर पर है। :- कालिदास - कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ है, काली का सेवक। कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में एक थे। कालिदास संस्कृत भाषा के सबसे महान् कवि और नाटककार थे। कालिदास ने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। कालिदास अपनी अलंकार युक्त सुंदर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उन्होंने अपने श्रृंगार रस प्रधान साहित्य में भी सौन्दर्य के साथ-साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। उनका नाम अमर है और उनका स्थान वाल्मीकि और व्यास की परम्परा में है। लेकिन कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ और मूर्ख थे। कालिदास की विवाह विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी से हुआ।कहा भी गया है- पुष्पेषु जाति पुरुषेषु विष्णुः। नारीषु रंभा नरपेषु रामः । नदीषु गङ्गा नगरेषु काञ्जि। काव्येषु माघ कवि कालिदासः। कालिदास विश्ववन्द्य कवि हैं। उनकी कविता के स्वर देशकाल की परिधि को लाँघ कर सार्वभौम बन कर गूंजते रहे हैं। इसके साथ ही वे इस देश की धरती से गहरे अनुराग को पूरी संवेदना के साथ व्यक्त करने वाले कवियों में भी अनन्य हैं। महाकवि कालिदास की गणना भारत के ही नहीं वरन् संसार के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में की जाती है। उन्होंने नाट्य, महाकाव्य तथा गीतिकाव्य के क्षेत्र में अपनी अदभुत रचनाशक्ति का प्रदर्शन कर अपनी एक अलग ही पहचान बनाई। जिस कृति के कारण कालिदास को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, वह है उनका नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम् जिसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनके दूसरे नाटक विक्रमोर्वशीय तथा मालविकाग्निमित्र भी उत्कृष्ट नाट्य साहित्य के उदाहरण हैं। उनके केवल दो महाकाव्य उपलब्ध हैं- रघुवंश और कुमारसंभव पर वे ही उनकी कीर्ति पताका फहराने के लिए पर्याप्त हैं। कालिदास संस्कृत साहित्य और भारतीय प्रतिभा के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। बहुसंख्यक विद्वानों की धारणा है कि वे मालवा के निवासी और उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य के नव-रत्नों में से एक थे। विक्रमादित्य का समय ईसा से 57 वर्ष पहले माना जाता है। जो विक्रम संवत संवत् का आरंभ भी है। इस वर्ष विक्रमादित्य ने भारत पर आक्रमण करने वाले शकों को पराजित किया था। कालिदास रचित ग्रंथों की तालिका बहुत लंबी है। पर विद्वानों का मत है कि इस नाम के और भी कवि हुए हैं जिनकी ये रचनाएं हो सकती हैं। विक्रमादित्य के नवरत्न कालिदास की सात रचनाएं प्रसिद्ध है। इनमें से चार काव्य-ग्रंथ है- रघुवंश, कुमारसंभव, मेघदूत, तथा ऋतुसंहार। तीन नाटक हैं- अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्र तथा विक्रमोर्वशीय। और अंत में है :- अमरसिंह- अमरसिंह 'अमरकोष ' नामक एक प्रसिद संस्कृतकोष रचयिता के थे। कहते है की यह जनम से बौद्ध थे , किन्तु उनके नाम के साथ सिंह जुड़ा होने से उन्हें क्षत्रिय समजा जाता है। यह भी कहा जाता है की बाद में अमर सिंह ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। भारतीय शब्दकोशों ने 'अमरकोष ' अद्वितीय है। अमरसिंह उत्तम कवी और व्याकरणचार्य भी थे। बुद्धगया में भगवान बुद्ध का एक प्राचीन मंदिर है। मंदिर के शिलालेख पर लिखा है कि उसके निर्माता अमरदेव थे। वे राजा विक्रमादित्य कि सभा के नवरत्नों में गिने जाते थे। अमर सिंह के अमरकोष का अनुवाद चीनी भाषा में प्राचीन कल में ही हो चुका था। अमरकोष के अतिरिक्त उनका एक ग्रन्थ और है - एकाक्षर नाममाला। कहा जाता है कि उन्होंने कई ग्रन्थों की रचना भी कि थी परन्तु अमरकोष जितना प्रसिद्ध हुआ उतने प्रसिद्ध अन्य ग्रन्थ नहीं हुए। अमरकोष को त्रिकाकाण्ड और नामलिंगानुशासन भी कहते है। इस ग्रन्थ की टीका करने वालो में बौद्ध , जैन और ब्राह्मण तीनो है।

नवरत्न पैनल- 3
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