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सम्राट विक्रमादित्य पैनल - 2

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 3 मिनट · Emperor Vikramaditya, Panel 2

कथाओं के अनुसार विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। इन्हें विक्रमसेन के नाम से भी जाना जाता था, यह भारतीय सम्राट थे। उनके साम्राज्य कि राजधानी उज्जैन थी। आख्यानों के अनुसार महाराज विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था। ईसा पूर्व 58 57 में प्रारंभ विक्रम संवत राजा विक्रमादित्य का चलाया हुआ माना जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार गंधर्वसेन के पिता देवराज इंद्र थे। उनके सेनापति का नाम वीरभद्र और मंत्री का नाम विष्णुदत्त था। गंधर्वसेन की पत्नी का नाम वीरमती था। उनके दो पुत्र हुए भर्तहरी और विक्रमसेन। उस समय मालवा एक स्वतंत्र राज्य था। कुछ वर्षों पश्चात शकों के राजा ने मालवा पर हमला कर वहाँ कब्जा कर लिया। भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि वे राजा विक्रमादित्य के नवरत्न कहलाते थे। ये सभी नवरत्न अपने -अपने क्षेत्र में विद्वान थे। कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना नीति-प्रदीप (आचरण का दीया) का श्रेय दिया है। महाराज विक्रमादित्य ने अपने सभा में नवरत्नों को रखने का प्रचलन सर्वप्रथम किया था उनको देखकर ही आने वाले राजाओं ने भी अपनी सभाओं में नवरत्नों को रखने का प्रचलन हुआ। विक्रमार्कस्य आस्थाने नवरत्नानि धन्वन्तरिः क्षपणकोऽमरसिंहः शंकूवेताळभट्टघटकर्परकालिदासाः । ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेस्सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ।।

सम्राट विक्रमादित्य पैनल - 2
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