शिव कथाएँ ›पट्टिका 437 · पड़ाव 76 / 141

चंद्रशेखर महादेव की कथा

🎧 ऑडियो कथा · लगभग 2 मिनट · The Story of Chandrashekhar Mahadev

आपके सम्मुख जो प्रतिमा है उसमें आप भगवान श्री हरि विष्णु को महादेव शिव के मस्तक को चंद्र से श्रृंगारित करते हुए देख सकते हैं । यह प्रसंग भगवान शिव के चंद्रशेखर स्वरूप की कथा से संबंधित है। बात तब की है जब भगवान् शिव, माता पार्वती से विवाह हेतु बारात लेकर महाराज हिमवान के महल के द्वार पर पहुंचे थे । वर के रूप में वधु के घर पहुंचे शिवजी के शरीर पर लिपटे सर्प, भस्म में रमा हुआ उनका अटपटा वेश, गले में धारण की हुई नरमुंडो की माला, जटाजूट केश वाला रूप और उनकी बारात में सम्मिलित भूत, पिशाच,प्रेत,गण,देव, दानव, असुर आदि को देखकर समस्त वधु पक्ष में त्राहि त्राहि मच गई । अपने जामाता और बारात के स्वागत के लिए खड़ी देवी पार्वती की माता देवी मैना तो मुर्छित ही हो गईं थीं । स्थिति की विकटता को देख कर देवी पार्वती के भ्राता का दायित्व संभाले हुए भगवान् श्री हरि विष्णु आगे आए । औघड़ रूपी भोले शंकर का अत्यंत मनमोहक श्रृंगार कर वे उन्हें वर के रूप में तैयार कर के लाए । श्री विष्णु ने भोलेनाथ के कर्पूर वर्ण पर लिपटी भस्म हटाई, उन्हें आभूषण पहनाए और उनके शीश पर चंद्र सुशोभित किया । जब श्रीविष्णु महादेव का श्रृंगार पूर्ण कर उन्हें विवाह मंडप में लाए तब उपस्थितजन मोहित हो गए । देवी पार्वती की माता ने उनकी बलाइयां लीं और अपनी बेटी का विवाह उनसे कराया । शिवजी का वही वररूपी स्वरूप चंद्रशेखर महादेव कहलाया ।

चंद्रशेखर महादेव की कथा
सुनेंआवाज़
Developed by Satyarth Shukla